वो कोई और नहीं तू ही था ख्वाबों में मेरे
रोज आता था तू भूली हुई यादों में मेरे
उम्र को मेरी दो चार घड़ी और बढ़ा देती है
जाने क्या बात है झूठे ही वादों में तेरे
वो जो मुमकिन नहीं मै उसका तलबगार हू क्यू
जिद झलकती है मुहब्बत के इरादों में मेरे
इल्लते-इश्क का मारा हू कुछ रहम तो करो
तमाम उम्र फ़ना कर दिया यादों में तेरे
यकीं नहीं है अगर जा उलट के देख जरा
मिलेंगे मेरे ही ख़त अब भी किताबों में तेरे
वो कोई और नहीं तू ही था ख्वाबों में मेरे
रोज आता था तू भूली हुई यादों में मेरे
Monday, December 27, 2010
Friday, October 15, 2010
ऐसा लोग कहते हैं
मै उसकी आँख से घायल हूँ ऐसा लोग कहते है
वो कहता है मेरे चर्चे उसे बदनाम कर देंगे
मगर मै तो नहीं कहता हू ऐसा लोग कहते है
हिचकता है, झिझकता है, सिमटता है ,बिखरता है
मुझे जब देखता है वो तो आहें सर्द भरता है
मचलता है वो जब तक दूर है तो पास आने को
मगर जब पास आता है तो शर्मा कर गुजरता है
सिकंदर हैं बहुत दुनिया में पर मुझसा नहीं कोई
दीवाने हैं तेरे लाखो मगर मुझसा नहीं कोई
बहुत होंगे तुम्हारे प्यार में मरने की चाहत में
तुम्हारे प्यार से जिन्दा हू मै मुझसा नहीं कोई
जो चेहरे से नहीं छुपता उसे कैसे छुपाऊ मै
जो बस दिल ही समझता है उसे कैसे बताऊ मै
उसे जिद है की मै इजहार उससे क्यों नही करता
जो है दिल से बयां उसको लबों तक कैसे लाऊ मैं
वो चाहे फिर मुझे यारो यही है आरज़ू मेरी
वो लौटे मेरी राहों में यही है आरज़ू मेरी
मुझे चाहत ना तारो की, नजारो की ना फूलों की
वो बस अपना कहे मुझको यही है आरज़ू मेरी
जरा सी बात पर मुझसे बिगड़ता रूठता है वो
खुद अपने आप से लड़ कर बिखरता टूटता है वो
कभी जब सामने आऊं तो नज़रें फेर लेता है
जरा ओझल हुआ तो बस मुझी को ढूढ़ता है वो
किया है फिर हवा ने बदमिज़ाजी बाग़ से देखो
की हर फूलों का चेहरा लाल है अब बाग़ में देखो
जला है आज परवाना ना जाने खता किसकी
मोहब्बत कर रहा था वो शमां की आग से देखो
निकलना चाहता था मै मगर फंसता रहा यारों
मै नंगे पांव जलती आग पर चलता रहा यारों
उसे अपना बनाने का जुनूं कुछ मुझपे ऐसा था
सितम करता रहा वो और मै हँसता रहा यारों
मै उसके प्यार में पागल नहीं होता तो क्या होता
मुझे पागल बनाने का कोई जरिया नया होता
किया है वक़्त ने साजिश मेरी चाहत की राहो में वरना
ना वो तन्हा हुआ होता ना मै तन्हा हुआ होता
हिचकता है, झिझकता है, सिमटता है ,बिखरता है
मुझे जब देखता है वो तो आहें सर्द भरता है
मचलता है वो जब तक दूर है तो पास आने को
मगर जब पास आता है तो शर्मा कर गुजरता है
सिकंदर हैं बहुत दुनिया में पर मुझसा नहीं कोई
दीवाने हैं तेरे लाखो मगर मुझसा नहीं कोई
बहुत होंगे तुम्हारे प्यार में मरने की चाहत में
तुम्हारे प्यार से जिन्दा हू मै मुझसा नहीं कोई
जो चेहरे से नहीं छुपता उसे कैसे छुपाऊ मै
जो बस दिल ही समझता है उसे कैसे बताऊ मै
उसे जिद है की मै इजहार उससे क्यों नही करता
जो है दिल से बयां उसको लबों तक कैसे लाऊ मैं
वो चाहे फिर मुझे यारो यही है आरज़ू मेरी
वो लौटे मेरी राहों में यही है आरज़ू मेरी
मुझे चाहत ना तारो की, नजारो की ना फूलों की
वो बस अपना कहे मुझको यही है आरज़ू मेरी
जरा सी बात पर मुझसे बिगड़ता रूठता है वो
खुद अपने आप से लड़ कर बिखरता टूटता है वो
कभी जब सामने आऊं तो नज़रें फेर लेता है
जरा ओझल हुआ तो बस मुझी को ढूढ़ता है वो
किया है फिर हवा ने बदमिज़ाजी बाग़ से देखो
की हर फूलों का चेहरा लाल है अब बाग़ में देखो
जला है आज परवाना ना जाने खता किसकी
मोहब्बत कर रहा था वो शमां की आग से देखो
निकलना चाहता था मै मगर फंसता रहा यारों
मै नंगे पांव जलती आग पर चलता रहा यारों
उसे अपना बनाने का जुनूं कुछ मुझपे ऐसा था
सितम करता रहा वो और मै हँसता रहा यारों
मै उसके प्यार में पागल नहीं होता तो क्या होता
मुझे पागल बनाने का कोई जरिया नया होता
किया है वक़्त ने साजिश मेरी चाहत की राहो में वरना
ना वो तन्हा हुआ होता ना मै तन्हा हुआ होता
Tuesday, October 12, 2010
उसके होंठों पे जब मेरा नाम आ रहा था
उसके होंठों पे जब मेरा नाम आ रहा था
जाने किस कशमकश में वो घबरा रहा था
आइना सामने था हकीकत का फिर भी
वो अपनी हकीकत को झुठला रहा था
चौंकता था की जैसे छुआ हो किसी ने
पर वो खुद के ही साये से टकरा रहा था
साफ जाहिर था रंगे-मुहब्बत नज़र से
फिर भी होंठो पे लाने से शरमा रहा था
जाने किस कशमकश में वो घबरा रहा था
आइना सामने था हकीकत का फिर भी
वो अपनी हकीकत को झुठला रहा था
चौंकता था की जैसे छुआ हो किसी ने
पर वो खुद के ही साये से टकरा रहा था
साफ जाहिर था रंगे-मुहब्बत नज़र से
फिर भी होंठो पे लाने से शरमा रहा था
Monday, October 11, 2010
और ज्यादा
देना ना दोस्तों मुझे आवाज और ज्यादा
खो जाऊंगा मै भीड़ में घबरा के और ज्यादा
रख ले बचा के आंसू रोना है और भी
क्यों की मुझे होना है बर्बाद और ज्यादा
मौका है आज उड़ ले, कल फिर ये परिंदे
तू रह नहीं सकेगा आजाद और ज्यादा
मुद्दत के बाद मै मिला उससे क्या सोच के
पर भड़के हुए थे उसके अंदाज़ और ज्यादा
बहका हुआ हू मै जो मेरा कसूर क्या है
साकी ने डाल दी थी शराब और ज्यादा
खो जाऊंगा मै भीड़ में घबरा के और ज्यादा
रख ले बचा के आंसू रोना है और भी
क्यों की मुझे होना है बर्बाद और ज्यादा
मौका है आज उड़ ले, कल फिर ये परिंदे
तू रह नहीं सकेगा आजाद और ज्यादा
मुद्दत के बाद मै मिला उससे क्या सोच के
पर भड़के हुए थे उसके अंदाज़ और ज्यादा
बहका हुआ हू मै जो मेरा कसूर क्या है
साकी ने डाल दी थी शराब और ज्यादा
हँस ले जरा
हँस ले जरा ,ये आज फिर हँसने की घड़ी है
रोने के लिए तेरी सारी उम्र पड़ी है.
तू ढूढ़ता है क्यों वफ़ा इस दौर में यहाँ
ये गुजरी हुई रश्म किताबो में पड़ी है
मरने का हौसला है गर तो कर ले इश्क तू
वो देख तेरे दर पे आके मौत खड़ी है
पुरनम है चाँद और खुशनसीब चांदनी
फिर भी मेरी दुनिया ये क्यूँ वीरान पड़ी है
रोने के लिए तेरी सारी उम्र पड़ी है.
तू ढूढ़ता है क्यों वफ़ा इस दौर में यहाँ
ये गुजरी हुई रश्म किताबो में पड़ी है
मरने का हौसला है गर तो कर ले इश्क तू
वो देख तेरे दर पे आके मौत खड़ी है
पुरनम है चाँद और खुशनसीब चांदनी
फिर भी मेरी दुनिया ये क्यूँ वीरान पड़ी है
Sunday, September 19, 2010
मैंने देखा
मैंने देखा सड़क के पार
कुछ नयी इमारते बनी थी
पहले नहीं थी शायद नयी ही होंगी
इमारतों के आगे कुछ नयी
विदेशी गाड़िया भी खड़ी थी
महँगी होंगी शायद आम आदमी
के पहुँच के बाहर !
मैंने सोचा किसी बड़े नौकरशाह
या किसी नेता , मंत्री का की होगी
वरना कौन इतनी जल्दी इतना सब कुछ
कर लेगा !
कहा से कर लेगा ?
कैसे कर लेगा ?
धन कहा आया होगा ?
ये गगनचुम्बी भव्य इमारते
ये आलिशान विदेशी गाड़िया
पर मै ये क्यों सोच रहा हूँ
किसने किया क्यों किया कहा से किया ?
मैंने अभी लोगों से सुना की
जल्द ही राष्ट्रमंडल खेलो की
तैयारिया चल रही थी
शायद उन्ही में शामिल किसी की हो
शायद ये भी उसी तैयारी का हिस्सा हो
मैंने देखा सड़क के पार ......!
कुछ नयी इमारते बनी थी
पहले नहीं थी शायद नयी ही होंगी
इमारतों के आगे कुछ नयी
विदेशी गाड़िया भी खड़ी थी
महँगी होंगी शायद आम आदमी
के पहुँच के बाहर !
मैंने सोचा किसी बड़े नौकरशाह
या किसी नेता , मंत्री का की होगी
वरना कौन इतनी जल्दी इतना सब कुछ
कर लेगा !
कहा से कर लेगा ?
कैसे कर लेगा ?
धन कहा आया होगा ?
ये गगनचुम्बी भव्य इमारते
ये आलिशान विदेशी गाड़िया
पर मै ये क्यों सोच रहा हूँ
किसने किया क्यों किया कहा से किया ?
मैंने अभी लोगों से सुना की
जल्द ही राष्ट्रमंडल खेलो की
तैयारिया चल रही थी
शायद उन्ही में शामिल किसी की हो
शायद ये भी उसी तैयारी का हिस्सा हो
मैंने देखा सड़क के पार ......!
Saturday, August 14, 2010
तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र
हे नव भारत के अस्थितंत्र
तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र
हर विघ्न विनय हो जायेगा
हर युद्ध विजय हो जायेगा
अभिमंत्रित कर लो स्वंशक्ति
फूंको उर्जा का अमिट मन्त्र
तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र
कुछ और नया संधान करो
अपनी छमता का भान करो
खुद राहें भी बन जाएँगी
होंगे सब आगे पथ अकंट
तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र
सुध बुध ना भुला देना अपने
खोकर कुछ इसको पाया है
ये सुख के दिन कुछ लोगों ने
अपना सब खोकर पाया है
कोशिश ये रहे हम लोगों की
ये रहे हमारी अब अनंत
तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र
हे इस भारत के अस्थितंत्र
तुम हो स्वतंत्र तुम हो स्वतंत्र
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http://www.samaydarpan.com/aug1/kavita.aspx
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जिंदगी भर
ख़ुशी की रह तकते रह गए हम जिंदगी भर
ग़मों ने यूँ सताया मेरे दिल को जिंदगी भर
हमारी असलियत को वो नहीं पहचान पाया
सफाई पेश करते रह गए हम जिंदगी भर
नज़र आया ना वो गलियों में मेरी भूल से भी
पर उसकी रह तकते रह गए हम जिंदगी भर
हम उनसे कह ना पाए हाल दिल का अपने "दीपक"
मगर इक आह भरते रह गए हम जिंदगी भर
दो घूंट पिलाये
इस बेबसी की आग को किस तरह बुझायें
कितना हम तुम्हे याद करे कितना भुलाएँ
इतने निशाने-सितम दोस्ती ने दे दिए
किस-किस को छोड़ दे अरे किस-किस को मिटायें
कुछ भी न बचा पास मेरे सब कुछ जल गया
कुछ गैरों ने फूंके कुछ अपनों ने जलाये
ये वक़्त आखिरी है और प्यास भी बहुत है
नफरत से ही सही कोई दो घूंट पिलाये
उसी के नाम से
लगने लगा है डर अब आशिकी के नाम से
दिल भर गया है अब तो दोस्ती के नाम से
यूँ इक सवाल बन गयी खुद मेरी जिंदगी
दिल भर गया है अब तो जीने के नाम से
दिल पर मेरे हालत जो आकर गुजर गए
उनको सुना रहा हूँ बेबसी के नाम से
इतनी पिला दी उसने और इतना बहक गए
डर लगने लगा है अब तो मयकशी के नाम से
गुमनाम जबसे वो हुआ गुमनाम हम हुए
पहचान थी तो मेरी बस उसी के नाम से
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